बुधवार, 19 सितंबर 2012
सूक्ष्म्ाता
भावाभिव्यक्ति में भाव बेहद सूक्ष्म जबकि शब्द बेहद स्थूल साबित
होते हैं और इसीलिए गहन भावों की अभिव्यक्ति शब्दों के माध्यम से
सम्पूर्ण कभी नहीं हो सकती । कुछ अनकहा शेष रह ही जाता है और कुछ
अकथ्य, शब्दों में व्यक्त हो ही जाता है ।
शुक्रवार, 14 सितंबर 2012
हिन्दी डे सेलेब्रेशन (व्यंग्य कविता)
आज हमने फिर मनाया
हिन्दी डे सेलेब्रेशन
दृश्य पटल पर ख़ूब दिखाया
हिन्दी का प्रेज़ेण्टेशन
देखो ! हिन्दी
का तो हो रहा
सभी जगह इम्प्लीमेण्टेशन
हिन्दी-प्रेमी अब तो कर लो
तुम भी इस पर सैटिस्फैक्शन ।
हिन्दी-भाषी प्रान्त तुम भी
पालो न कोई फ़्रस्ट्रेशन
फिर भी भारी अंग्रेज़ी हिन्दी पर
कुछ तो समझो सिचुएशन ।
गँवारीपन की तुम जि़द छोड़ो
सभ्य नहीं कहाओगे
बिन सीखे अंग्रेज़ी लेसन
बात नहीं
सुनेगा बाबू
जब तक न हो अंग्रेज़ी सेशन ।
अंग्रेज़ी सभ्यता की जय बोलो
सिखाया जिसने सिविलाइज़ेशन
यह तो पवित्र पाश्चात्य भाषा है
इससे तनिक लो इन्स्पीरेशन ।
अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है यह तो
क्यों करते हो तुम ऑब्जेक्शन
पन्द्रह साल से सालों साल का
किया है हमने प्रोविज़न
अब तो सदियों यही चलेगा
हमारा मानो
ऑब्लिगेशन ।
हिन्दी प्रेमी सकुचाकर
कुछ रुककर बोला-
धन्य अंग्रेज़ी सौतेली जननी हो
कराया जिसने
लैंगवेज सेपरेशन
भाषा-आधार पर नेता प्रान्तों का
कर बैठा देखो
रि-कॉन्स्ट्रक्शन
आती जिससे बू अलगाव की
जिससे होता डिस्ट्रक्शन
हिन्द-प्रदेश का वासी जिसका
भुगत रहा रिट्रिब्यूशन ।
अब हम तुमसे साफ़ कहेंगे
नहीं करेंगे हेज़ीटेशन
मत लाओ नौबत तुम ऐसी कि
पुस्तक-घर हो हिन्दी का क्रेमेशन
नग्न सत्य यह हो सकता है
नहीं है इसमें एक्ज़ेज़रेशन
जैसे संस्कृत जा दफ़नी है
और हुई है
आउट ऑफ़ फ़ैशन ।
हिन्दी को सच में लागू करने में
बोलो, लोगे कितना डयूरेशन ?
अंधेरे को अब न और बढ़ाओ
न फैलाओ कोई इल्ल्यूज़न
न ही काग़ज़ पर घोड़े दौड़ाओ
न दो तुम जस्टीफि़केशन ।
सर्वत्र विकास तो तब ही होगा,
एक ही भाषा में
जब हो, एजूकेशन
तभी एकात्मता आ पाएगी
यही हमारा कन्क्लूज़न
मोती अनेक धागा पर एक ही
होगा तभी
नेशनल एंटीग्रेशन ।
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( ‘’180 डिग्री का मोड़’’ काव्य-कृति से )-
हिन्दी दिवस पर विशेष
मंगलवार, 31 जुलाई 2012
हिंसा के विरुद्ध साहित्य
हिंसा के विरुद्ध साहित्य ( Literature
against Violence ) : साहित्य का यह रूप समझने के लिए हमें पहले दोनों को अलग-अलग करके
देखना होगा । हिंसा क्या है
? और साहित्य क्या है ? साहित्य हम सभी जानते
हैं, यहॉं बैठा हर व्यक्ति लेखनी से साहित्यकार है और दिल से भी । फिर बारी
आती है हिंसा की । हिंसा क्या है ? इस शब्द के प्रति
विभिन्न नज़रिये और हिंसा की परिभाषाऍं इतने विविध हैं जितनी उत्तर-दक्षिण और पूरब-पश्चिम
दिशाऍं । हिंसा की अतिरेकी अवधारणा से लेकर सत्य की रक्षा के लिए हिंसा को धर्म
एवं नीतिसम्मत मानना इसका एक व्यापक फलक है और चूँकि साहित्य तो मानव-सभ्यता के
विकास के साथ ही मौखिक, चैत्रिक, अलिखित, लिखित आदि सोपानों में
जीता रहा है । इसमें सारे प्राचीन, प्राग्-ऐतिहासिक, एवं आधुनिक साहित्य को
सम्मिलित किया जा सकता है । चूँकि
भारत-वर्ष की मूलभूत विशिष्टता, गुणधर्म या जीन; धर्म एवं अध्यात्म
रहा है और अध्यात्म से संबंधित विश्व
का उत्कृष्ट साहित्य हिंसा के परिणामस्वरूप
ही नष्टीकरण की भेंट चढ़ जाने के बावजूद आज तक प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है और
इससे भी आगे बढ़कर उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक, और आगे
भौगोलिक सीमाओं को पार कर थाईलैण्ड, कम्बोडिया, चीन, जापान, श्रीलंका, नेपाल, सुदूर ईरान आदि तक में जनमानस एवं रीति-रिवाजों में भी
व्याप्त है ।
जैन साहित्य में हिंसा की सूक्ष्मतम परिभाषा मिलती है
जो कहती है मन, वचन कर्म से किसी को दु:ख पहुँचाना हिंसा है । ईसा के
अनुसार मन में हिंसा का विचार हिंसा ही है । इससे आगे बढ़कर हम जब धर्म एवं अध्यात्म
के अनूठे और इकलौते उत्कृष्ट ग्रंथ यानी गीता की बात करते हैं तो हिंसा की बड़ी
तर्कसंगत, न्यायसंगत, और व्यापक व्याख्या
मिलती है जो एक ओर चींटी की हत्या को भी हिंसा मानती है, कर्मों
के सिद्धान्त से जोड़ती है, दूसरी ओर कहती है कि अन्याय के विरुद्ध शस्त्र उठाना
और धर्म की रक्षा करना हर मानव का धर्म है ( यहॉं ‘धर्म’ शब्द
व्यापक अर्थ रखता है, संकीर्ण नहीं ); और इस
तरह निष्काम कर्म के लिए प्रेरित करती है । कब हिंसा हिंसा नहीं और कब अहिंसा भी
हिंसा है, इसकी समग्रतम व्याख्या गीता नाम का हमारा पवित्र
साहित्य बता चुका है हज़ारों वर्ष पहले ही ।
भारत की आज़ादी की दिशा में हिंसा के इन्हीं विपरीत
नज़रियों ने महति भूमिका निभायी है । जहॉं
गॉंधी जी ने ‘अहिंसा परमोधर्म:’ पर ज़ोर
दिया तो इसके साथ ही एक परन्तुक भी जोड़ दिया कि अन्याय के खि़लाफ़ आवाज़ उठाना
हिंसा नहीं है । अन्याय सहकर चुप रहना कायरता है । हिंसा अहिंसा का यह अर्थ ! कायरता
बुरी है इसलिए वीर बनिये । कैसे वीर ? ऐसे वीर जो अन्याय के
विरुद्ध आवाज़ तो उठाऍं और हँसते हुए एक गाल पर मार खाकर दूसरा गाल भी आगे कर दें-
लेकिन अपने सिद्धान्त और उद्देश्य पर अडिग रहते हुए सीने पर सामने से गोली खाने
को तैयार रहें । लोकमान्य तिलक, सुभाष चन्द्र बोस, सावरकर, भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु, आज़ाद आदि हिंसा की
गीता वाली समग्र परिभाषा को जीते रहे । और इस हिंसा के जवाब की हिंसा में भी हम यह
सुनते रहे कि-
‘सर फ़रोशी की तमन्ना अब
हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है ।’
हिंसा अहिंसा का विचार साहित्य में आज़ादी
तक प्रत्यक्ष तौर पर बड़े मायने रख रहा था क्योंकि
आज़ादी के लिए क्रान्ति एक सम्पूरक और अति आवश्यक घटक है फिर चाहे वह वैचारिक
क्रान्ति हो, सैद्धान्तिक क्रान्ति
हो या फिर थोपी गई ख़ूनी क्रान्ति जिसके साक्षी रूस, चीन और हाल में
अफ़गानिस्तान एवं ईराक आदि देश बने हैं । यूरोपीय देशों में सत्ता-परिवर्तन
वैचारिक क्रान्ति का बिन्दु रहा है मुख्यत: वर्तमान में ।
साहित्य को शुरुआत से
ही विभिन्न खांचों में बॉंटने की स्वाभाविक
सामाजिक परम्परा रही है । विचारों के
वैभिन्नय से ही जैन-साहित्य, बौद्ध-साहित्य आदि, फिर वर्तमान दौर में
दलित साहित्य, स्त्री-विमर्श; और अब नक्सली साहित्य, वाम-साहित्य जैसे साहित्यिक खांचों का जन्म
हुआ है । अब तो साहित्य भी हिंसक होने
लगा है । कई स्थानों पर हिंसक-साहित्य बरामद होता है । समझने की बात है
कि साहित्य अपने आप में हिंसक हो सकता है या साहित्य जिस विचार का वाहक है वह
हिंसक या अहिंसक या उदासीन (न्यूट्रल) होता है !
हॉं, इस विषय में एक स्पष्ट
प्रतीति अवश्य है । हिंसा की सराहना या समर्थन सामान्य जन या हम नहीं करते । मेरे
विचार में साहित्य का उद्देश्य हिंसा को प्रोत्साहन देना नहीं होना चाहिए । हॉं, वैचारिक क्रान्ति का सूत्रपात
तो साहित्य करता ही रहा है सदियों से । साहित्य समाज का आईना भी है और मार्गदर्शक
भी; तो साहित्य को, मार्गदर्शन का काम समाज का
प्रतिबिम्ब दिखाते हुए करना होगा । साहित्य नकारात्मक हिंसा का समर्थक नहीं हो सकता
। हॉं, साहित्य का धर्म है अन्याय के विरुद्ध सामाजिक क्रान्ति
के पक्ष में वह सकारात्मक हिंसा का पक्ष ले सकता है । यह पूर्णत: निर्भर करता है लेखक
या रचनाकार की स्वयं की विचारधारा, देशकाल एवं परिस्थिति पर । उग्रता या सौम्यता व्यक्ति-विशेष
का गुण है जो भाषा का आधार लेकर साहित्य में परिणत होता है और फिर वह साहित्य उग्र
या सौम्य, हिंसक या अहिंसक कहा जाने लगता है ।
लेकिन जब हम बात करते हैं जि़म्मेदार लेखक या साहित्य की
तो एक जि़म्मेदार लेखक या साहित्यकार का
धर्म है कि वह अपने साहित्य से हिंसा को बढ़ावा न दे बल्कि उसे ख़त्म करने के वास्ते
सौहार्दपूर्ण साहित्य की रचना करे जो आहत तन, मन और मस्तिष्क पर मलहम का काम कर सके यही सच्चा
लेखक-धर्म है । ऐसा नहीं कि ऐसा साहित्य अब लिखा नहीं जा रहा । ख़ूब लिखा जा रहा
है जो गूंगों की आवाज़ भी बना है । आज हम सेमिनार इसी विषय पर कर रहे हैं और हमारी
लेखक बिरादरी यहॉं उपस्थित है तो आज हम आहवान करें एक-दूसरे को; और सेमिनार
के माध्यम से बाहर भी यह संदेश दे सकते हैं कि कम से कम हमारा साहित्य सैद्धान्तिक
रूप से हिंसा को बढ़ाने वाला नहीं बल्कि हिंसा को कम करने वाला होगा । यहॉं हिंसा से
तात्पर्य शारीरिक हिंसा के साथ ही शाब्दिक और मानसिक हिंसा से भी है ।
हॉं, गीता के संदेश की तरह हर मानव का धर्म है कर्म के सिद्धान्त
का पालन करना । और अगर सत्य की स्थापना के लिए आवश्यक हो तो लेखनी रूपी शस्त्र
को हिंसा का भार उठाने के लिए भी तैयार रहना चाहिए । जब सत्य की स्थापना के लिए ईश्वर
अवतार ले सकता है तो हम जीवितों का भी तो कुछ कर्म का धर्म बनता ही है । कृष्ण ने यही संदेश दिया है
गीता में, जो मेरी दृष्टि
में समग्रतम है-
‘’यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लार्निभवति भारत
अभ्युत्थांधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम
परित्राणाय
साधूना विनाशाय च दुष्कृतां
धर्म संस्थापनार्थाय
सम्भवामि युगे-युगे’’
‘’उपरोक्त पर्चा
इंडियन सोसायटी ऑफ़ ऑथर्स (InSA) द्वारा ‘हिंसा
के विरुद्ध साहित्य’ विषय पर 28 जुलाई, 2012 को गॉंधी
शान्ति प्रतिष्ठान में आयोजित सेमिनार में लेखिका द्वारा पढ़ा गया ।‘’
शुक्रवार, 13 जुलाई 2012
उफ़्फ ये घटना !
सामूहिक अपराध या सामूहिक अपराध के प्रति मूक
सहमति/मूकदर्शिता/उदासीनता मानसिक बीमारी है या अपराधियों से डर ? सामूहिक असंगठित अपराध में
भागीदारी/इसकी स्वीकार्यता क़बीलायी संस्कृति है या मानवीय सभ्यता ? क्या भीड़ में जानवर या हैवान बन
जाना हमारा/हमारे पुरुषों का असली चारित्रिक रंग है ? (ये बीस-बाईस साल के बच्चे या
नवयुवक नहीं हैं, बल्कि बीमार पुरुषत्व के बीज हैं जो
पेशेवर एवं संगठित अपराधी न होते हुए भी सामाजिक घटक रूपी पेड़ में तब्दील होकर आबो-हवा को कितना और विषाक्त करेंगे सहज ही
आकलन किया जा सकता है । उस बच्ची में भीड़रूपी क्रूर पुरुष मानसिकता आखि़र क्या
खोज रही थी ? बहुत दुखद और अन्तत: हताश कर देने
वाला घटनाक्रम है और इसकी पराकाष्ठा है ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति । मैं
इन्तज़ार कर रही हूँ (और साथ ही खुद से सवाल भी ) कि क्या इन लड़कों की
बहनें माताऍं और पिता या भाई खुले तौर पर
अपने घर के बच्चों की इस हरकत की कड़ी
भर्त्सना करेंगे और उन्हें स्वयं अपनी ओर से दण्ड के लिए प्रस्तुत करके
सामाजिक इकाई के रूप में अपना मूल और अहम नैतिक दायित्व निभायेंगे ?
आइये खुद से
पूछें हम कि- "संस्कारहीन विकास की दौड़ में हम कहॉं जा रहे हैं ? "
मंगलवार, 19 जून 2012
दबाव
मूल रूप से हर बच्चा एक इनसानी स्वभाव के अनुरूप स्वभावत: एक कोरी स्लेट होता है । अगर बाह्य रूप से आरोपित विचार उसे वैसा कुछ और बनने के लिए प्रेरित न करे तो हर बालक सहज, शान्तिप्रिय और सरल ही होता है । जैसे-जैसे शिशु बड़ा होता है समाज, देश-काल और लोगों की सकारात्मक या नकारात्मक क्रिया अथवा सोच से उसमें एक व्यक्ति के रूप में परिवर्तन होता है ।
कभी-कभी यह बाह्य आरोपित दबाव इतने नकारात्मक होते हैं कि उस सरल, सहज शिशु को बदल कर रख देते हैं । यदि इन दबावों की प्रतिक्रिया वह करे तो परिस्थितियों को बदल कर अनुकूल भी कर सकता है । अगर दबाव हावी रहें तो क्रोध और अन्य हीन भावनाऍं पनपती हैं जो अगर अनियंत्रित हो जाऍं और बाहर निकल पड़ें तो व्यक्ति समाज और व्यवस्था का अपराधी (सूक्ष्मत: चाहे परिवार का, समाज का, देश का या मानवता का) बन जाता है; अन्दर ही रह जाए तो उसकी स्वयं की हीन भावनाऍं उसे भस्मासुर बना देती हैं और अगर वह इन तीनों स्थितियों पर नियंत्रण कर ले तो सन्त बन जाता है ।
महत्वपूर्ण और सब कुछ बदल कर रख देने वाला तथ्य यह है कि कोई भी वैयक्तिक इकाई- कब, कितना, किससे, क्या और कैसे लेगी और उसे अन्तर-संश्लेषण के बाद किसे, कब, कैसे, कितना और क्या लौटाएगी ।
सोमवार, 4 जून 2012
संस्कारहीन विकास की दौड़ में हम कहाँ जा रहे हैं
वर्ष 2008 जब अपनी शैशवावस्था में किलकारी भरने की शुरुआत ही कर रहा था तब जहाँ मुम्बई में दो नवयुवतियाँ विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश और 'यत्र नारयस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता' की अवधारणा वाले देश में अपने महिला होने के अघोषित अपराध की सज़ा में कराह रही थीं वहीं पटना अपने वैभवशाली प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास में 'लड़कियों से बदसलूकी' का एक काला पन्ना जोड़ रहा था और कोच्चि एवं पुष्कर में विदेशी महिला पर्यटकों से बदसलूकी की काली दास्तान भारत के 'अतिथि देवो भव' के अतिथि धर्म की धज्जियाँ उड़ा रही थीं । दास्तानें न ही अकेली हैं और न ही नयीं । इनके अलावा भी बहुत से कलंकित उपमान मौजूद हैं । क्या हो गया है हमारे पुरुषों को ? ऐसी मानसिक कुण्ठा; जो चाहे पश्चिमी चकाचौंध की देन हो, सेक्सजनित हो, मीडिया द्वारा परोसा जा रहा स्टीराइड हो या फिर पूरे सामाजिक ताने-बाने की विफलता, हमारे पुरुषों को जानवर से भी बदतर बना पाने में सक्षम कैसे हो गई कि उसे अपनी हवस की कुण्ठा में न ही 70 वर्ष की वृध्दा में अपनी मां नज़र आती है न ही 2-3 वर्ष की बच्ची की मासूमियत में अपनी बेटी, पोती या बहन का प्रतिबिम्ब उसको अराजक जंगलीपन से रोक पाने में सफल हो पाता है । निश्चित तौर पर 100 प्रतिशत पुरुष ऐसे नहीं हैं लेकिन जब 'सामूहिक जंगलीपन' को स्वीकार्यता मिलने लगे तो मजबूरी में यह मान लेना पड़ेगा कि पूरा मानव समाज ख़तरे के निशान को पार कर चुका है जहाँ से मानव-सभ्यता का पतन बहुत ज़्यादा दूर नहीं दीख पड़ता । 40-50 आदमियों ने आखि़र आपस में इतनी अनैतिक अपराध की परस्पर स्वीकृति कैसे दे दी ? यह तर्क मान भी लिया जाए कि सारे आदमी उन दोनों महिलाओं से छेड़छाड़ नहीं कर रहे थे लेकिन इस कटु सत्य को कैसे नकारा जा सकता है कि बहुतायत आदमी उस छेड़छाड़ में शामिल थे । अन्यथा अगर मान लिया जाए कि सिर्फ़ 10 आदमी इस घोर अनैतिक करतूत में शामिल थे तो क्या बाक़ी 40 आदमियों का उन पर क़ाबू पाना ज़रा भी मुश्किल था ? वह भी तब, जब वे अपने हाथ में चाकू या एके 47 राइफल लेकर छेड़छाड़ नहीं कर रहे थे । क्या उस भीड़ में मौजूद अधिकांश पुरुष या लड़के एक जैसा गन्दा और अनैतिक सोच रहे थे? क्या उनमें आपस में एक-दूसरे का लिहाज भी नहीं था कि अगर 'मैं लड़कियों के साथ शारीरिक छेड़छाड़ करुंगा तो दूसरा मेरे बारे में क्या सोचेगा !' क्या उनमें से प्रत्येक के मन से सामाजिक अस्वीकार्यता का डर समाप्त हो चुका था, क्या नैतिकता और अनैतिकता की झीनी सीमा रेखा भी मिट गई है ? बहुत सारे ऐसे प्रश्न हैं जो एक सामूहिक-अपराध के बाद सिर उठाकर जवाब पूछते हैं पूरे समाज से, समाज सुधारकों से, प्रशासन तंत्र से और हर उस व्यक्ति से जो समाज की सबसे छोटी स्वतंत्र इकाई है। अनैतिक कार्य-व्यापार में भी बहती गंगा में हाथ धो लेने की प्रवृत्ति और बच निकलने की अवश्यम्भावना पुरुष को इस निकृष्टतम सीमा तक पहुंचा पाने में सक्षम अगर हो ही गई है तो निश्चित ही कहीं न कहीं संपूर्ण समाज की मूल अवधारणा ही छिन्न-भिन्न हो रही है जिस पर गंभीर मनन की आवश्यकता है । समाज का कोई एक घटक यानी व्यक्ति सामाजिक धारा से हटकर सकारात्मक या नकारात्मक कुछ भी क्रिया-प्रतिक्रिया करता है तो उसकी वैयक्तिक बनावट, परिस्थितियाँ, परिवेश, पारिवारिक संस्कार, उसकी विचारधारा और स्वतंत्रता के नाते उसे व्यक्तिश: क्रिया-प्रतिक्रिया मानकर स्वीकार्य अवश्य कर लिया जाता है क्योंकि भारत सांस्कृतिक विभिन्नताओं वाला देश है । इसके अतिरिक्त भारत में वेदान्ती, सांख्य, कर्म, भक्ति योग आदि दर्शनों के साथ ही चार्वाक के भोगवादी दर्शन को भी स्वीकार्यता हासिल है । लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि विभिन्न सांस्कृतिक एवं धार्मिक विविधताओं वाले देश में हमारा संविधान मानवीय मूल्यों की रक्षा करने वाला अहम दस्तावेज़ है जो हर व्यक्ति की सुरक्षा की गारण्टी बिना किसी धर्म, जाति या लिंग भेद के आधार पर देता है । फिर से सवाल वहीं खड़ा है कि महिलाओं को जब संविधान ने समान अधिकार दे रखे हैं और भारतीय संस्कृति, महिलाओं को देवीतुल्य सम्मान देती है तो फिर क्या कारण है कि हमारे पुरुष न ही संस्कृति का सम्मान करने की नीयत रखते है न ही क़ानूनों का ख़ौफ़ उन्हें महिलाओं के प्रति अपराध की प्रवृत्ति से रोक पाता है । पुरुष मानसिकता स्वभावत: महिलाओं पर शासन करने की होती है; इसके मूल में चाहे उनकी शारीरिक, मानसिक, जैविक बनावट हो, परिवार के ताने-बाने या शहरीकरण के परिवेश में निजता के अभाव से उपजी यौन कुण्ठा हो, दीर्घकाल से महिलाओं की पुरुषों पर रही आर्थिक निर्भरता का कम होना हो, शिक्षा-अशिक्षा, गरीबी के आंकड़े हों या दोनों के बीच आधारभूत अन्तर से उपजी हीन भावना हो- अधिकांश भारतीय पुरुष महिलाओं का समान आधार पर आत्मा से सम्मान नहीं करते । अगर करते भी हैं तो दिखावे या शिष्टाचार के तौर पर और इसके लिए निश्चित तौर पर सिर्फ़ पुरुष-वर्ग को ही जि़म्मेदार नहीं ठहराया जा सकता । बहुत सारे जि़म्मेदार घटकों में सबसे बड़ी जि़म्मेदारी उभर कर आती है समाज की और फिर परिवार की, जिसमें एक पुरुष 'बालक' की पौध बनकर पहले-पहल उगता है । उसकी परवरिश की जि़म्मेदारी परिवार की होती है । उसमें औरतों की इज्ज़त करने के संस्कार उसी समय रोपे जा सकते हैं । जो बच्चा बचपन से ही अपने घर या आसपास के माहौल में देखता है कि मेरा परिवार या समाज पुरुष-प्रधान है, मेरे पिता का कथन अंतिम सत्य होता है । जिसे बचपन से ही अपनी बड़ी बहनों तक के रक्षक के रुप में जताया जाता है, पिता शराब पीकर या बिना पिए घर में मार-पिटाई या गाली-गलौज करता हो, वह बच्चा भले ही अपने पिता से घृणा करने लगे लेकिन ऐसे व्यवहार की स्वीकार्यता का बीज उसके संस्कारों में पड़ चुका होता है । निश्चित तौर पर हर परिवार में ऐसा नहीं होता लेकिन बात उस वर्ग की हो रही है जिनमें 'संस्कार' ऐसे ही बीजों के पेड़ होते हैं । बहुत से बच्चों में बिलकुल ऐसी ही विद्रोहात्मक प्रवृत्ति देखने न मिले लेकिन उनके व्यक्तिगत जीवन के फैसलों में इसका अक्स ज़रुर दिखाई पड़ जाता है । ऐसे बच्चे किशोरावस्था के दौर में इससे उपजे दब्बूपन से बाहर आने की कोशिश में अपने व्यक्तित्व को निखारने के बजाय उसमें विभिन्न कुण्ठाओं का समावेश कर अपने फैसलों से न सिर्फ़ अपने बल्कि अपने से जुड़े लोगों के जीवन में भी तूंफान ले आते हैं । समाज में इसी व्यवस्था से उत्पन्न एक वर्ग ऐसा भी है जो सामाजिक बंधन या अपमान के डर से रिश्तों का निबाह करता है और यही वजह है कि जिन रिश्तों पर सामाजिक मुहर न लगी हो जल्दी टूट जाते हैं । बहुतायत में भावनात्मक रिश्ते इसी गवाही की कमी की भेंट चढ़ जाते हैं । निजी रिश्ते जो दो लोगों के बीच होते हैं, जिनका गवाह कोई नहीं, जिनको निभाने का सामाजिक बंधन नहीं होता, वे पारिवारिक या सामाजिक स्वीकार्यता के अभाव में इन्हीं कुण्ठाओं की बलि चढ़ जाते हैं क्योंकि दोनों में से एक जिसकी मानसिकता में छुपे हुए अपराध की स्वीकार्यता हो यानी अगर किसी को पता न चले तो वह अपने अपराध से मुकर भी सके और समाज के सामने उसकी प्रतिष्ठा भी कम न हो तो वह आसानी से अपराध कर ग़ुज़रने के बाद भी भोला बना रह जाता है क्योंकि वह तो चोर सिध्द हुआ ही नहीं यानी 'पकड़े गए तो चोर नहीं तो साहूकार' । और ऐसे फैसलों में जो दूसरा पक्ष ईमानदार है, समाज का एक संवेदनशील, जि़म्मेदार घटक है, वह जीवन भर सज़ा पाता है- जहाँ उसकी पूरी जि़न्दगी प्रभावित हो जाती है वहीं उसका वैयक्तिक विकास भी अवरुध्द होता है और समाज भी विकास में उसकी भागीदारी से वंचित रह जाता है । क्या आम क्या ख़ास सभी के पारिवारिक झगड़े आए दिन देखने सुनने मिल जाते हैं। इस तरह की व्यक्तित्व की ख़ामियां समाज के भीतर चुपके-चुपके बड़े गहरे और दीर्घकालीन परिवर्तन लेकर आती हैं जिसकी कहानी मानव विकास एवं सुधार के आंकड़ों से नदारद रहती है और औचक ही किसी न किसी सामाजिक विकृति के रुप में सामने आती है । सारा संकट नीयत में खोट का है और इसके मूल में है संस्कार में खोट । हालांकि प्रशासन, पुलिस, न्यायपालिका आदि से बना पूरा एक तंत्र है, किसी भी तरह के अपराध से निपटने के लिए लेकिन समाज में आई हर विसंगति को पुलिस या क़ानून के हथियार से नहीं रोका जा सकता । पुलिस का काम लोगों को नैतिकता का पाठ पढ़ाना नहीं, लेकिन हाँ अपराधी को पकड़कर उसे न्यायालय के हवाले करना ज़रुर उसका दायित्व है । और फिर हम ऐसे अराजक संस्कारों वाले समाज में सारी जि़म्मेदारी का ठीकरा पुलिस या प्रशासन के मत्थे कैसे फोड़ सकते हैं । आखि़र पुलिस भी तो इसी सामाजिक व्यवस्था से उपजी संतानें हैं । करेले के पौधे से आम का फल उपजेगा, हमारा ऐसा सोचना भी हास्यास्पद और मूढ़ मति का परिचायक है। समाज या परिवार में अगर कहीं भी कुछ गलत बातें जन्म ले रही हैं तो माँ-बाप, बड़े बुजुर्ग उससे अनभिज्ञ या बेबस कैसे हैं और क्यों है ! जब माँ-बाप अपने बच्चों को संस्कार देने की प्राथमिक जि़म्मेदारी को गौण समझ बैठेंगे तो वे बाहरी माध्यमों से बटोरे हुए कचरे को ही ज्ञान एवं संस्कार समझ कर बर्ताव करेंगे ही । ऐसा नहीं कि कोई भी माँ-बाप अपने बच्चों को ग़लत राह पर जाने से रोकना नहीं चाहते हों लेकिन चाहने मात्र से कुछ नहीं होने वाला, ठोस प्रयत्न करने होंगे उसके लिए, और ख़ुद भी वही आचरण एवं रास्ता अख़्तियार करना होगा जो वे अपने बच्चों को दिखाना चाहते हैं । क्योंकि एक विडम्बना यह भी है कि माँ-बाप एवं बड़े बुज़ुर्ग भी तो उसी समाज की देन हैं और हमेशा सिर्फ़ उम्र पक जाने मात्र से संस्कारों की खाद पड़ जाए, आवश्यक नहीं, क्योंकि माँ-बाप बनने का नैसर्गिक अधिकार तो प्रकृति ने दे दिया है लेकिन मानव सभ्यता का पाठ तो एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है और- 'तज़ुर्बात की सूरत में लिया था समाज से उन्होंने जो, वही लौट रहे हैं वे' । इसलिए समाज की सबसे बड़ी सामूहिक जि़म्मेदारी है । आजकल सामाजिक व्यापार-व्यवहार में जो सतहीपन आ गया है उसके मूल में सांस्कृतिक मूल्यों से पलायन की हमारी प्रवृत्ति ही जि़म्मेदार है । भौतिक रुप से उन्नत व्यक्ति सामाजिक श्रध्दा का पात्र स्वत: बन जाता है फिर चाहे उसने वह दौलत कैसे भी कमाई हो जबकि हमारी संस्कृति में महर्षि, ऋषि-मुनियों का स्थान राजाओं से भी ऊँचा यूं ही नहीं मान लिया गया था, उसके पीछे पूरा दर्शन है ज्ञान का, अध्यात्म का, योग का । क्या कारण है कि जिन बातों को हम पुरातनपंथी मानते थे उसकी ओर फिर से पूरा विश्व चल पड़ा है फिर चाहे वह स्वामी रामदेव का चमत्कारी योग दर्शन हो, सूर्य को जल का अर्ध्य देकर आंखों की विकृति ठीक करने का विज्ञान हो, पुष्पक विमान बनाम एयरजेट विमान हों, ब्रह्मास्त्र हो या रिमोट नियंत्रित मिसाइलें, या ऐसे अनन्त उदाहरण हों, सबके मूल में है संपूर्ण रुप से विकसित मानव-सभ्यता का एक विकसित संस्कार-दर्शन । भोगवादी दर्शन से कहीं उच्च है अध्यात्म की अवधारणा, इसका इतिहास 5000 वर्षों से भी अधिक पुराना है । जिसकी अवधारणाएं हर भारतीय की रसोईघर (छोटा औषधालय) से लेकर हिमालय की कंदराओं तक में बिखरी पड़ी हैं, उनका कहीं कोई तो वजूद रहा होगा । क्या हमारा किसी चीज़ के प्रति अज्ञान किसी वस्तु की अस्तित्वहीनता की कसौटी हो सकता है ? अगर कोई आदिवासी रेडियो में से निकलती आवाज़ को देवता का चमत्कार मान ले या अगर उसे बन्द मोबाइल फोन का इस्तेमाल न आता हो तो क्या उसके द्वारा मोबाइल की पूरी प्रौद्योगिकी को नकार दिया जाना हम तर्कसंगत मान लेंगे ? कहने का तात्पर्य यह है कि अब हम विस्फोटक मुहाने पर बैठे हुए हैं और अगर हमने अपने संस्कारों को अपना जीवन मानना शुरु नहीं कर दिया तो फिर ऐसा अराजक जंगल बढ़ता जाएगा जहाँ जिसकी लाठी होगी उसी की भैंस होगी, जिसको मौका मिलेगा, वहीं शिकारी बन बैठेगा । मूल्य महत्वहीन हो जाएँगे । पिछले दशक में हमने भौतिक उन्नति के सोपानों के झंडे गाड़े हैं और मीडिया क्रांति बनाम सूचना एवं प्रसार की क्रांति के युग की शुरुआत देखी है । जहाँ एक ओर हर आम एवं ख़ास के जेब में मोबाइल पहुंच गया है तो हर घर में, मशरुम की तरह ऊगते टीवी चैनलों ने टीवी सेटों के माध्यम से अपनी पैठ बना ली है । इंटरनेट ने पूरी दुनिया को एक गांव बना दिया है । पूरी दुनिया ने अमेरिका पर हुए 11 सितंबर के हमले का सजीव प्रसारण देखा तो 24 घंटे के समाचार चैनलों ने सास-बहू और पति-पत्नी के झगड़ों को लाइव दिखाया । ऐश्वर्या-अभिषेक की शादी, करीना-शाहिद का ब्रेक अप ब्रेकिंग-न्यूज़ और लाइव ब्रेकिंग न्यूज़ बना तो राखी सावंत जैसी अपरिपक्व हालांकि प्रतिभासम्पन्न लड़की अपने लटके-झटकों से समाचार चैनलों पर एक ICON की तरह पेश की गई । राखी सावंत की प्रतिभा को नकारना या कम आंकना उद्देश्य नहीं पर समाचार चैनलों से प्रश्न है कि क्या उनका उद्देश्य सिर्फ़ व्यावसायिक फ़ायदा कमाना है ? क्या राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में उनका योगदान सिर्फ़ समाचार परोसने तक सीमित है ? क्या मीडिया ईमानदारी से सिर्फ़ महाभारत के संजय की भी भूमिका निभा रहा है ? पिछले वर्ष एक व्यक्ति द्वारा अपनी भांजी के शारीरिक शोषण की खबर ब्रेकिंग न्यूज़़ की तरह दिन भर छाई रही । मीडिया ट्राइल हो गया। उसे अपराधी बलात्कारी बना दिया गया । कुछ दिन बाद ही उस व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली और बड़ी बेशर्मी से वही चैनल उसकी मौत की ख़बर भी दिखाता रहा । अगर अपनी बेग़ुनाही के चलते उसने आत्महत्या की हो तो उसका हत्यारा कौन होगा । समाचार माध्यमों को हड़ताल पर बैठी मेधा पाटकर दिखाई नहीं पड़तीं लेकिन आमिर ख़ान के पहुंचते ही भोपाल गैस कांड से लेकर नर्मदा-पुनर्वास का धरना हर चैनल पर लाइव दिखाया जाने लगता है । क्या तथाकथित सर्वाधिक बुध्दि संपन्न मीडिया जगत को मानसिक रुप से भौतिक दिवालियेपन का लकवा मार गया है ? ऐसा नहीं कि सारे चैनल संपूर्ण रुप से इसी मानसिकता के शिकार हैं लेकिन टीआरपी का खेल सभी को कुछ न कुछ जुगत के फेर में डाल ही देता है । पहले तो मीडिया पर लगातार हर तीसरे दिन अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या, सलमान आदि-आदि फिल्मी सितारों को बार-बार किसी न किसी बहाने दिखाया जाता है फिर लोगों से उनके आदर्श के बारे में पूछा जाता है । अब जो बच्चे टीवी पर जिन चेहरों को महिमामंडित रुप में देखेंगे, उनकी छवि ही तो उनके मन-मस्तिष्क पर अंकित होगी न ! मीडिया में काम करने वाला हर व्यक्ति अन्तत: समाज का एक घटक है, उस पर भी समाज में होने वाली हर घटना का असर पड़ना अवश्यम्भावी है और इसी वजह से भी मीडिया का नैतिक दायित्व भी बनता है समाज के प्रति, सामाजिक-नैतिक मूल्यों के प्रति । मीडिया के धुरंधरों का तर्क रहता है । "We can't take any moral high ground". क्या उच्च नैतिक प्रतिमान कोई नकारात्मक प्रवृत्ति है ? और अगर मीडिया के उच्च-पदों पर बैठा सम्पादक वर्ग ही Moral High Ground लेने का साहस नहीं करेगा तो निचली सीढ़ी पर बैठे रिपोर्टर आदि इस झंडे को थामने का साहस कैसे कर सकेंगे । इसका यह तात्पर्य नहीं लिया जाना चाहिए कि मीडिया ने आम आदमी को अपनी आवाज़ नहीं दी है। सर्वाधिक दक्ष एवं क्षमता संपन्न 'मीडिया' की ओर आम आदमी भी आंखें उठाए हाथ फैलाए न्याय की आस करने लग पड़ा है और यह एक उपलब्धि भी है लेकिन मेरा सरोकार वहाँ से है जहाँ विवेकशीलता से समझौता कर लेने की मानसिकता होती है । फि़ल्मों या टीवी में जिस तरीक़े से जिस्म के हाव-भावों का कार्य-व्यापार होता है और उसे समाचार माध्यम बार बार हाईलाइट करते हैं वे हमारे कुण्ठित बच्चों, युवाओं एवं पुरुषों को छेड़छाड़ जैसी घटनाओं के लिए उकसाते हैं । हालांकि ऐसा कतई नहीं है कि लड़की के कम कपड़े पहनने या होटल, पब में जाने या उत्तेजक नृत्य करने से पुरुष वर्ग को उसकी शारीरिक अस्मिता से खिलवाड़ करने का लाइसेन्स मिल जाता है । यह तो वही बात हुई कि 'मेरी नीयत ठीक नहीं, मेरा अपने पर नियंत्रण नहीं, इसलिए दूसरा मेरे हिसाब से कपड़े पहने' । लेकिन यह एक प्रमाणित तथ्य है कि आप कोई भी एक चीज़ बार-बार देखेंगे, पढ़ेंगे या सुनेंगे तो उससे एक रस की उत्पत्ति होगी और फिर संचारी भाव उपजेगा । क्यों दु:ख भरे दृश्य या संगीत हमारी ऑंखों में आंसू ला देते हैं और हास्य कार्यक्रम कैसे एक दु:खी व्यक्ति को भी बरबस हँसा जाते हैं । तात्पर्य यह नहीं कि टीवी या फि़ल्मों में ऐसे दृश्य दिखाए ही न जाएँ लेकिन उसकी सीमारेखा खींचनी बेहद आवश्यक है । शिल्प शेट्टी और रिचर्ड गेरे का किस-सीन पूरे दिन भर और हर ब्रेक के पहले और हर ब्रेक के बाद दिखाने से क्या औचित्य सिध्द हुआ है ये तो उस वक्त की उस चैनल की टीआरपी ही बता देगी । यह कहना कि लोग देखना चाहते हैं इसलिए दिखाते हैं, सरासर ग़ैरजि़म्मेदाराना है । दुनिया में तीन देश ऐेसे हैं जहाँ बालिका हत्या की दर में इज़ाफ़ा हुआ है । दो अफ्रीकी देशों के अलावा तीसरा देश भारत है और यह तब है जब भारत अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत के बूते महाशक्ति बनने के सपने साकार करने के प्रयत्नों में लगा है और हमने बालिकाओं से संबंधित मानवाधिकार घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए हुए हैं । 1000:927 पुरुष:स्त्री अनुपात के बूते हम यह सपना पाल रहे है ? हरियाणा, पंजाब में यह अनुपात तो और कम है । स्त्रियों के लगातार घटते अनुपात के कारण अशिक्षा, ग़रीबी, आर्थिक-विषमता, पाश्चात्यीकरण आदि कुछ भी हों लेकिन इसके पीछे छिपी सामाजिक विसंगतियों को नज़रंदाज करना समीचीन नहीं होगा । गांवों में बालिका भ्रूण हत्या के मूल में स्त्री: पुरुषों के अन्तर्सम्बन्धों की दबी-छुपी आन्तरिक सच्चाई के आइने में सिर्फ़ लड़के की चाह नहीं बल्कि लड़कियों के प्रति पुरुषों की गिध्द दृष्टि भी है । यह वहाँ ज्यादा सच है जहाँ माँ खुद अपनी बच्ची को इसलिए मार देती है कि जिस शारीरिक, मानसिक शोषण से वह गुज़री है, उसकी बेटी को वह न भोगना पड़े । हम किस आत्मवंचना के युग में जी रहे हैं, जहाँ अपने रोग को पहचानना भी नहीं चाहते । इसके प्रति गहन संवेदनशील सामाजिक सरोकारों की अत्यावश्यकता है । रोग के मूल को पहचानेंगे तभी तो उसकी दवा कर पाएँगे । कितने ही परिवारों में महिलाओं की जान की कीमत पर एबॉर्शन करवा लिया जाता है। यह मानसिकता कि औरत बच्चे पैदा करने की मशीन है, मर भी गई तो दूसरी ले आई जाएगी । फिर जो माँ-बाप अपने बच्चों के लिए सब कुछ लुटा देते हैं वहीं विकसित भ्रूण की भी हत्या करते समय अपनी उस अजन्मी औजाद के प्रति ज़रा भी संवेदनशीलता या अपराध-बोध महसूस नहीं करते ! क्या हम हत्यारे माँ-बाप हैं ? फिर हम किस मुंह से नैतिकता की दुहाई देते हैं । उस वक्त हमारा वात्सल्य कहाँ चला जाता है । यह सोच कि 'अजन्मा भ्रूण' घर की खेती है, जब चाहे पैदा किया, जब चाहे मार दिया, परले दरजे की विशुध्द संवेदनहीनता और क्रूरता की पराकाष्ठा है । समाज को इस दिशा में गंभीरता से पहल करनी ही होगी। महिलाओं के प्रति असंवेदनशीलता, अजन्मे बच्चे की क्रूरतापूर्ण हत्या- फिर हम संस्कार-मूल्यों की रक्षा क्या ख़ाक करेंगे, पैसों या धन के लालच में अपने अपनों का खून, रिश्तों में छल-फ़रेब, धोखा, नृशंसा हत्याएं, डकैती, भ्रष्टाचार, चोरी आदि, हर चीज़ की अति की हवस कहाँ लेकर जा रही है हमें ! और जिस समाज में यह सब होता हो, उसकी स्वीकार्यता हो, वह स्वयं कभी भी सभ्य समाज बनने का दम्भ भले ही कर ले वास्तविक अर्थों में सभ्य नहीं हो सकता । क्या विरासत हम भावी पीढ़ी को सौंपेंगे । क्या हम उन्हें ऐसे एकतरफ़ा विकास की सौगात देना चाहेंगे जो ख़ुद विध्वंस के ढेर पर बैठा हो । चाहे सरकार कितने ही कड़े क़ानून बना ले- न्याय मिलने में विलम्ब, बड़ी संख्या में अपराधों का दर्ज न होना या न किया जाना, दोहरे सामाजिक मानदण्ड, विषाक्तता से ग्रसित समाज, भौतिक सम्पन्नता की कीमत पर नैतिक मूल्यों से समझौता और अभिजात्य वर्ग के ग्लैमर के जादू का भोण्डा राग अलापता मीडिया, आदि अनेक वजहें हैं, जो समाज को भीतर से दीमक की तरह खोखला कर रही हैं । चाहे कभी भी-सुधार की ईमानदार शुरुआत तो हर व्यक्ति को स्वयं से और परिवार से करनी ही होगी ताकि हमारे बच्चे या युवा, आदम-जानवरों की शक्ल में तब्दील होकर सभ्यता के मुख पर कालिख पोतने वाले कोयले न बन सकें और पूरे मानव-समाज को शर्मसार करने वाली घटनाओं की पुनरावृत्ति पर लगाम लग सके । क्योंकि बिना चारित्रिक विकास के सभ्यता एकांगी और इसलिए बेमानी है । भौतिक या बाह्य विकास के साथ आन्तरिक या आत्मिक विकास में व्यक्ति का सम्पूर्णत्व समाहित है । यह आलेख साहित्यिक पत्रिका अक्षर-पर्व के 21वीं सदी पर विशेषांक (संदर्भ: इक्कीस वींसदी का पहला दशक ) में विचार/लेख के तहत प्रकाशित किया गया था । प्रासंगिकता की दष्टि से जि़न्दा लिंग-बम कहानी के बाद पोस्ट किया जा रहा है । | |
मंगलवार, 8 मई 2012
जि़न्दा लिंग-बम
पूरे शहर में हड़कम्प मचा हुआ था कि आखि़र सीधे-सादे, मृदुल और सरल से दिखने वाले युवा डॉक्टर दम्पति निधि
और राजन को पुलिस ने गि़रफ्तार किया है । गर्मा-गर्म चर्चाऍं चल रही हैं । मीडिया
के तमाम चैनलों पर सनसनीखेज़,
हैरतंगेज़ विशेष-कार्यक्रम सीधे ग्राउण्ड ज़ीरो से लाइव कवरेज के तौर पर चल रहे
हैं - ‘यही है वह घर जहॉं से डॉक्टर दम्पति……….........……..’ फिर अगले चैनल पर- ‘ हम आपको बताऍंगे वो कमरा,
वो ऑपरेशन थियेटर जहॉं से ये दोनों डॉक्टर............................ ‘ फिर तीसरे चैनल
के स्टूडियो में पूरा पैनल बैठा है । पैनल में एक मनोचिकित्सक, एक सामाजिक कार्यकर्ता, एक राजनेता बैठे हुए हैं,
एक अभिनेत्री को भी बैठा रखा है,
जिसका ध्यान विषय पर कम और अपने कपड़ों पर ज़्यादा है; एक वकील भी है जो क़ानूनी संभावनाओं को गिना रहे हैं । लाइव इंटरव्यू भी
चल रहे हैं । फील्ड पर पुलिस अधिकारी से सवाल दागते रिपोर्टर एक अनोखे अपराध के
बारे में उतावले होकर पूछ रहे हैं- सर.......... सर………! बताइए ............ आपको कैसे
पता लगा कि ये डॉक्टर दम्पत्ति इस घटना को अंजाम दे रहे थे................ और
ऐसा कब से चल रहा था ........ ?
सर.......... सर………क्या आरोपियों ने अपना गुनाह कु़बूल कर लिया है ?
गुनाह ही कुछ
अजीब सा था जिसे अमानवीय तो कह सकते हैं लेकिन फिर भी गुनहगारों से नफ़रत नहीं दिल
में ? ऐसा क्यों ? चारों तरफ़ एक
अजीब सी गहमागहमी थी जिसमें गुनाह की चर्चा तो ज़ुबान पर थी लेकिन सामान्यत:
लोगों के हृदय में एक अनकहा सन्तोष था । क्या
थी यह घटना, क्या था यह गुनाह, जिसके लिए युवा डॉक्टर दम्पति
को गि़रफ्तार किया गया था ?
ज़रा पीछे
चलते हैं और निधि तथा राजन की कहानी उन्हीं
की शुरुआत से शुरु करते हैं । निधि और राजन दोनों ही अनाथाश्रम में पले-बढ़े थे
लेकिन सौभाग्य से एक धनी परिवार ने उन दोनों और अन्य कुछ बच्चों की पढ़ाई का
ख़र्च उठा लिया था । निधि और राजन बचपन के स्वाभाविक दोस्त तो थे ही, उनमें पटती भी बहुत थी
बचपन से । प्रतिद्वन्द्विता और वैचारिक झगड़े न के बराबर रहे दोनों के बीच
बचपन से ही । लगता था दोनों एक दूसरे का आईना है । एक को जान लो तो दूसरे को अपने
आप जान जाओगे । मेहनती और पढ़ाई के प्रति लगन भी पक्की थी दोनों की । दोनों ने
साथ ही मेडिकल-प्रवेश की परीक्षा दी थी, साथ ही स्कॉलरशिप ली,
साथ ही इंटर्नशिप की और साथ ही डॉक्टरी की आगे की पढ़ाई भी की । इसके बाद एक ही
हॉस्पिटल में साथ नौकरी भी की । इतने लम्बे समय तक का साथ, विवाह का नैसर्गिक साथ भी बन गया और देखिए आज दोनों एक
साथ ही गिरफ्तार होकर जेल में बंद हैं अपराधी बनकर ।
अभी दो
साल पहले ही दोनों ने अस्पताल की नौकरी छोड़कर अपना निजी क्लीनिक खोल लिया था ।
दोनों का अपने आश्रयदाता अनाथालय में लगातार आना-जाना था । वहॉं के सभी बच्चों और
कर्मचारियों का इलाज निधि और राजन पारिवारिक दायित्व समझकर करते रहे थे हमेशा ।
दो साल पहले की ही घटना थी । अनाथालय की एक नाबालिक बच्ची के इलाज के दौरान अवाक्
कर देनेवाली दास्तान से रुबरु हुई थी
निधि । वह बच्ची जिस स्कूल में पढ़ती थी, वहॉं के चौकीदार ने उस फूल को अपनी हवस से मसल दिया था । निधि को यह बात
काफी समय बाद बच्ची से बातचीत के दौरान पता लगी । निधि ने राजन को बताया था जैसा
कि वे दोनों हमेशा शेयर करते थे सब कुछ । दोनों बच्ची के स्कूल भी गये लेकिन
चौकीदार चम्पत हो चुका था और स्कूल प्रशासन को तो न घटना की ख़बर थी और न वे इसे
सच मानना भी चाहते थे । आखि़र स्कूल की प्रतिष्ठा की कीमत को उस बच्ची की घायल
अस्मिता से भी से भी ज़्यादा ऑंकने की मानसिकता थी उनकी । निधि और राजन के सामने इतने चुनौतीपूर्ण क्षण
कभी नहीं आए थे । हालांकि उन्होंने जीवन संघर्ष में बहुत कुछ देखा झेला अवश्य था
। काफी मानसिक संघर्ष और ऊहा-पोह के बाद अन्तत: दोनों ने उस वक्त चुप रहना ही
उचित समझा । हॉं !
उस बच्ची की सामान्य मानसिक हालत बहाल करने का दायित्व
अवश्य निभाया दोनों ने । लेकिन एक गिल्ट काटती रहती थी दोनों को हमेशा । फिर
ख़बरों में भी ऐसी घटनाऍं पिछले डेढ़-दो वर्ष के दौरान कुछ ज़्यादा ही सामने आने
लगी थीं । दोनों अक्सर इस बारे में चर्चा
करते । निधि कई तीखे सवाल भी करती एक पुरुष के रूप में राजन से और दोनों मिलकर
विश्लेषण करते किसी बलात्कारी की मन:स्थ्िति का । कभी यह निष्कर्ष निकलता कि
ऐसे लोग एकदम सामान्य होते हैं लेकिन बाहरी
उत्तेजक माध्यमों के दौर में अपनी भावनाओं का सम्मानजनक आउटलेट न कर पाने की
विवशता और अज्ञानता दीर्घकालिक असर वाली एक तात्कालिक वजह होती है । ऐसे लोग
पुरुषप्रधान मानसिकता में विकसित बच्चे होते हैं जिनके मन में अन्तरतम तक बैठा
है कि नारी या मादा एक वस्तु है और जैसे
वे पेस्ट करते हैं,
नशा करते हैं, खाते-पीते हैं वैसे ही भोग्य है नारी । वो दिन गये जब हम
पढ़ते थे “योनी नहीं रे नारी’’
। आज-कल तो फिल्मों से लेकर विज्ञापन और खेल तक में नारी एक जीती जागती इनसान कम प्रोडक्ट ज़्यादा नज़र आती है
। कभी-कभी यह निष्कर्ष निकलता कि जिसे हम
अपराधी बलात्कारी मान रहे हैं वे स्वयं किसी परिस्थितिवश हीन भावना से ग्रस्त
और कहीं-कहीं मानसिक रूप से बीमार रोगी हैं जो पीडि़त भी हैं और पीड़क भी और कहीं न कहीं उन्हें भी इलाज की ज़रूरत है ।
निधि कहती कि यदि ये रोगी हैं तो क्या इन्हें दूसरों का जीवन
ध्वस्त कर देने का अधिकार दिया जा सकता है और क्या इस कुकृत्य को माफ़ किया जा
सकता है ? यह तो उसी जि़न्दा बम की
मानिन्द हैं जो फटेंगे तो दूसरे का भी और ख़ुद का भी विनाश ही करेंगे । और
ऐसे जि़न्दा बमों को डिफऱ्यूज़ करना
नैतिक कर्तव्य नहीं है मानवता का ?
निधि संजय दत्त की लम्हा फि़ल्म का उदाहरण देते हुए कहती कि राजन बताओ एक अबोध
बालक जिसे न यह पता है कि ईश्वर नाम की
कोई चीज़ होती है या नहीं,
स्वर्ग-नर्क की अभिकल्पना होती क्या है और न जिसे यह पता है कि अल्लाह और ईश्वर
या ईसा, वास्तव में क्या है या इनमें कोई फर्क है भी
या नहीं और जो कुछ उसे सिखाया जा रहा है वह धर्म है या अधर्म है, शिक्षा है या
अशिक्षा; जो उसे शिक्षा दे रहे हैं
वे शिक्षक हैं या कसाई या मौत के ठेकेदार; जिसे यह सब, कुछ भी पता नहीं है । बस
उसे तो कहा गया है कि स्वर्ग की चाबी एक रिमोट का बटन है, जिसे दबाते ही वह स्वर्ग में पहुँच जाएगा; उसे आत्मघाती
बम बना दिया गया है । तथाकथित स्वर्ग की चाबी के बटन की ओर कुछ पवित्र-से शब्द
बड़बड़ाते और रिमोट का बटन दबाने की कोशिश करते उस मासूम को संजय दत्त द्वारा गोली
मार देना उचित था या उसे ऐसा करने से न रोकना और सैकड़ों लोगों की जान चले जाते
देखना ? सिर धुनने लेने वाले सवाल होते वे और उसके जवाब भी सिर पीट लेने वाले ही होते । इसी कश्मकश और आत्मसंघर्ष
से जूझते निधि और राजन आज-कल नर के रूप में आदमी की चरमवादी मनोवृत्ति की
दुघर्टनाओं की बहुतायती की ख़बरों से दो-चार भी हो रहे थे । राजन निधि को समझाता
कि सदियों से जो पुरुषवादी मानसिकता है, आज के विकृत दौर में जिन पुरुषों को मानसिक रूप से बीमार कर देती है सेक्स के प्रति, और जिनका नियंत्रण स्वयं पर कमज़ोर होता है,
तथा चूँकि वे
अपने से शारीरिक रूप से निर्बल व्यक्ति पर ही हावी हो सकते हैं अत: महिलाऍं एवं बच्चियॉं उनका आसान शिकार बन जाती हैं । फिर निधि सवाल करती कि टीन-एज के
लड़के, प्रौढ़, बुड्ढे सब तो एक ही तरह से बीमार हैं ! क्या कोई क्राइटेरिया है इन जि़न्दा लिंग बमों का कि
बुड्ढा बम ऐसा नहीं करेगा और मिनी बम वैसा नहीं करेगा ?
फिर यह चर्चा होती कि पुरुष प्रधान भारतीय समाज में
महिलाऍं हमेशा से पुरुषों के अहं को सन्तुष्ट
करने का ज़रिया रही है । नारी मात्र भोग्या
है पुरुष की नज़र में । नहीं तो दुनिया के एक भी पिता को आप अपनी पुत्री या
पुत्री-स्वरूप बच्चियों पर अपनी हवस थोपने और उनकी मासूम अस्मत कुचल देने के बाद
जीवित नहीं देख पाते क्योंकि वह स्वयं शर्म से गढ़कर मर जाता । तो क्या बेशर्म
है हर ऐसा नर, जो लिंग के रूप में निकृष्टतम
बम लिए है ? जो हर वर्ग की नारी-
बुज़ुर्ग, जवान, बालिक,
नाबालिग यहॉं तक की 2-4
साल तक की मासूम बालशिशु तक को अपना नैसर्गिक शिकार मानता है ? निधि कहती- राजन तुम भी तो एक पुरुष ही हो ! हर पुरुष ऐसा तो नहीं होता ! राजन कहता-निश्चय ही नहीं होता लेकिन दुनिया में ऐसे पुरुषों का प्रतिशत
बेशक न्यूनाधिक हो,
लेकिन बढ़ता जा रहा है । पीडि़तों में क्या किसी भी लड़की का पिता या भाई इस ख़बर
को हलके तौर पर ले सकता है कि 24 घण्टे में पॉंच बलात्कार एक ही शहर में और
उनमें से भी तीन बच्चियॉं ? निधि
कहती- बात प्रतिशत के बढ़ने-घटने तक सीमित नहीं है । जिस के साथ घटती है यह घटना
और जो दूसरे संवेदनशील देख/सुन कर भुगतते हैं ऐसी त्रासदी तथा इससे आगे बढ़कर ऐसी
घटनाओं की पुनरावृत्ति पुन: प्रेरित करती है अगली पुनरावृत्ति के लिए । फिर पुलिस-व्यवस्था
की तमाम विडम्बनाओं के बावजूद पुलिस हमारे और हमारे पड़ोसी के घर चौकीदारी का काम
नहीं कर सकती । पड़ोसी को तो पड़ोसी धर्म निभाना ही होगा । आखि़रकार कहने के लिए
हम एक सभ्य समाज में जी रहे हैं जहॉं
मानवीय-मूल्य सर्वाधिक अहम हैं । पर हम भी ऐसे हाथ पर हाथ रखकर कैसे बैठ सकते हैं
! कैसे सह लें इन घटनाओं को ? क्या हम भूल पाये हैं अपने अनाथालय की उस मासूम के दर्द
को ? देखा नहीं गाल पर चुटकी
भी लो तो चहकते-चहकते कैसे चुप हो जाती है अचानक ?
चर्चा के दौरान ही अनाथालय से केयर-टेकर सूरज का फोन आता
है राजन के मोबाइल पर कि सुधा की तबीयत ख़राब है । पिछले दो दिन से स्कूल भी नहीं
जा रही है, बुख़ार भी है और डरी-सहमी
भी है । पूछने पर कुछ बोलती भी नहीं । शायद अपनी निधि दीदी को ही कुछ बताए । आप
दोनों तुरन्त आ जाइए । निधि भी यह सुनकर किसी अनजान आशंका से अन्यमनस्क हो उठती
है । निधि और राजन पहुँचते हैं अनाथालय । आठ वर्षीय सुधा को अकेले में बहलाती निधि
उससे घुमा-फिरा कर पूछती है । सुधा डरकर धीरे-से बताती है कि वो जो रिक्शे वाले
अंकल है न ! ………… (चुप्पी)..... वो न ...... सब बच्चों को छोड़कर मुझे बाद में
छोड़ते हैं और फिर....... और फिर.....
कहते-कहते रोने लगती है सुधा । निधि पूछती
है उससे परेशान होकर और फिर क्या सुधा बेटा ! लेकिन लाख पूछने पर भी बता नहीं पाती सुधा हालांकि निधि को उसके हाव-भाव
और सहमी ऑंखों से अंदाज़ा लगाते देर नहीं लगती । सुधा कहती है – निधि दीदी आप सूरज
अंकल से कह दो न !
कि मुझे स्कूल न भेजें । मैं नहीं जाऊंगी रिक्शे में स्कूल । निधि अवाक् है..... फिर से ? निधि समझाती/बहलाती है सुधा को । इधर उसके दिमाग में
उथल-पुथल मची है । यह हो क्या रहा है ? आखि़र कब तक ?
क्या पहली बार चुप रह कर ग़लती नहीं की उन्होंने ! इसी बीच उसे पता चला कि वह चौकीदार भी स्कूल में फिर वापस आ चुका है और
नन्हीं को घूर-घूर कर देखता है । निधि का दिमाग़ पूरी तरह घूम रहा था । यह किस
समाज के लोग हैं- खु़ल्ले तेज़ाबी ज़हर पूरे समाज के लिए ! क्या किया जाए इनका ? ख़ैर, तुरन्त तो निधि ने सूरज
को हिदायत दी कि अभी सुधा को स्कूल न भेजे, वह बात करेगी और नन्हीं को भी न भेजे स्कूल अभी । निधि पूरे रास्ते भर
चुप थी वापसी में लेकिन दिमाग़ में चक्रवात था । क्या स्कूल भेजना बन्द करने से समस्या का समाधान हो जाएगा ? और कब तक ? ये दोनों नहीं तो कोई और बच्ची, कोई और नहीं तो कोई और,
फिर ........ राजन समझ चुका था कि क्या
गम्भीर बात हो सकती है निधि की चुप्पी में । दोनों की आपसी अबोली समझ-बूझ थी एक दूसरे के प्रति ।
उस रात
निधि और राजन सोये नहीं पूरी रात और अन्त में तय हुआ एक नैतिक गुनाह – कि बस अब
और नहीं। अब और किसी जि़न्दा लिंग बम को अपने संज्ञान से छोड़नेवाले नहीं हैं
निधि और राजन । चूँकि दोनों अनाथ थे, दोनों की कोई
जि़म्मेवारी भी नहीं थी आगे-पीछे । सोचा- जो होगा अंजाम, देखा जाएगा, पर रोक लगाने / सूरत बदलने की कोशिश हमें करनी ही होगी । इस काम में उन्होंने
सूरज को विश्वास में लिया । शुरुआत की
नन्हीं के गुनहगार स्कूल के चौकीदार से । सूरज बहलाकर उसे निधि और राजन के क्लीनिक लाया । चौकीदार उसी तरह
अनभिज्ञ था अपने साथ होनेवाली दुर्घटना से
जैसे कि मासूम नन्हीं अनजान थी अपने साथ घटने वाले दर्दनाक हादसे की आहट से
। बातों-बातों में इलाज के बहाने बेहोशी
की दवा देकर राजन और निधि ने उस चौकीदार
के जिन्दा लिंग बम को स्थायी रूप से डिफ्यूज़ कर दिया था । अब कभी उसकी सेक्स
की बत्ती न ही जल सकेगी और न ही किसी
मासूम के शील रूपी मोम को जला और गला सकेगी कभी, यही उसकी सज़ा थी । फिर नम्बर आया सुधा को स्कूल ले जाने/लानेवाले रिक्शे
वाले का । उसे लाना आसान था । सूरज उसे भी ले आया था क्लीनिक । उसके साथ भी निधि-राजन ने वही
सुलूक़ किया । दोनों ने कहीं शिक़ायत भी नहीं की । पुलिस से भी नहीं । आखि़र क्या
बताते ? अब तो जो भी घोषित बलात्कारी होते, मामला शत-प्रतिशत पक्का सही साबित होता, उसे छोड़ते नहीं निधि-राजन । किसी भी मामले में कोई
शर्म से मुँह नहीं खोल सका था अब तक । इससे निधि और राजन का साहस भी उसी तरह बढ़ा
था जैसे कि बलात्कार के बाद पकड़ से बच जाने पर किसी बलात्कारी के हौसले बुलन्द
हो जाते हैं सामान्य सिद्धान्त की तरह । लेकिन कितना फ़र्क़ था दोनों पक्षों के
हौसलों में ! निधि और राजन के क्लीनिक
में पिछले साल भर से 25 लिंग-बम डिफ़्यूज़ किये जा चुके थे । निधि-राजन हर ऑपरेशन
के बाद दु:खी भी होते लेकिन एक नि:श्वास लेकर कहते- हमें एक न एक दिन तो जेल जाना
ही है लेकिन यह तय है कि इन पच्चीस जि़न्दा
लिंग बम रूपी बलात्कारियों से हमने न जाने कितनी बच्चियों / महिलाओं को बचा लिया
।
इस बार
निधि-राजन ने कुछ ज़्यादा ही कठोर कदम उठाया था । शायद गॉंधीजी की वह बात सत्य
होने को थी कि पवित्र साध्य के लिए साधन भी पवित्र ही होने चाहिए । ख़बर थी- अमीर घर के 18-25 साल
के चार लड़कों ने सामूहिक बलात्कार किया
चलती कार में एक नाबालिग लड़की का । पुलिस ने रिपोर्ट भी नहीं लिखी दबाव में । ये लड़के जिनका भविष्य अभी बनना था, एक नाबालिक लड़की का भविष्य ख़राब कर चुके थे । उलटे
उसे धमकी भी दे रहे थे कि अगर मुँह खोला तो अश्लील विडिया क्लिप........ । लड़की इलाज के लिए निधि-राजन के क्लीनिक आई थी । लड़की पहचानती थी इन चारों
लड़कों को । ये लड़के पहले भी ऐसी घटनाओं को अंजाम दे चुके थे यानी स्वभाव से
बलात्कारी बन चुके थे । उनके लिए एक नारी की अस्मत को तार-तार करना रोमांचकारी इंद्रिय
सुख के अतिरिक्त कुछ नहीं था । उनमें से
दो लड़कों को राजन उसी पीडि़त लड़की की मदद से अपने क्लीनिक लाने में कामयाब हो
गया था । और फिर उन दोनों जि़न्दा लिंग बमों को भी डिफ़्यूज़ कर दिया गया था । अब
दो शिक़ार और बाक़ी थे । यहीं पर निधि और राजन से ग़लती हो गई । कभी तो होनी थी, कोई तो बहाना बनना था !
उन दोनों लड़़कों के मॉं-बाप को पता चल गया था उन चारों
लड़कों की आपसी बातचीत से (आखि़र कब तक छुपता) ?
बस फिर क्या था । रातों-रात निधि-राजन के खि़लाफ़
ग़ैर-ज़मानती वॉरण्ट,
छापा, गि़रफ्तारी और यह सारा हड़कम्प भरा घटनाक्रम ।
सारे चैनल और उनके पैनल वैसे ही चीख रहे थे –जैसे
उस लड़की के बलात्कार की घटना पर चीख रहे थे । भाषा एकदम समान थी- (1) कौन हैं ये
बलात्कारी दरिन्दे......... (2) देखिए ये दरिन्दे डॉक्टर....... जिन्होंने
लड़कों का पूरा जीवन ख़राब कर दिया । वक़ील वही दलील दे रहे थे, सामाजिक कार्यकर्ता वही समझा रही थी कि कैसे निधि और
राजन को किसी के सेक्स–जीवन को ख़त्म करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती और उन्हें
कड़ी सज़ा अवश्य मिलनी चाहिए । पुलिस के
आला अधिकारी वही बात कर रहे थे कि ‘क़ानून
अपना काम करेगा‘ । और निधि और राजन शान्त सन्तुष्ट पीठ सीधी
किये बैठे थे कि चलो कुछ लड़कियॉं तो बच गईं ऐसी नारकीय पीड़ा झेलने से ! निधि और राजन को पता था कि उनका हश्र एक दिन यही होगा
लेकिन कम से कम वे यह संदेश तो देने में क़ामयाब हो ही गये हैं कहीं न कहीं कि ‘जि़न्दा लिंग बमो !
सम्भालो अपनी अवैध आग़ को;
नहीं तो डिफ्यूज़
कर दिये जाओगे । हम नहीं तो कोई और निधि-राजन पैदा होंगे जो बचाऍंगे मासूम
बच्चियों को महिलाओं को वृद्धाओं को और अब
तो मासूम लड़कों को भी; ऐसे जि़न्दा लिंग बमों से ।
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नोट: प्रवासी दुनिया डॉट कॉम पर हाल ही में प्रकाशित.
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